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भगवद्गीता 17.15
बोलने से पहले पूछिए: क्या यह सच है, क्या यह प्रिय है, क्या यह हितकारी है?
भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 15
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ ca yat
svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅ-mayaṁ tapa ucyate
हिन्दी भावार्थ
जो वाणी किसी को उद्वेग न दे, जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो, तथा स्वाध्याय का अभ्यास — इसे वाणी का तप कहा जाता है।
अंग्रेज़ी अनुवाद · English translation
Speech that causes no distress, that is truthful, pleasant and beneficial, along with regular study — this is called discipline of speech.
सरल शब्दों में व्याख्या
बोलने से पहले पूछिए: क्या यह सच है, क्या यह प्रिय है, क्या यह हितकारी है?
संदर्भ
श्रीकृष्ण तीन प्रकार के तप बताते हैं — शरीर, वाणी और मन का। यह वाणी का तप है।
यह कब मदद कर सकता है
जब कोई बातचीत तनावपूर्ण लगे, या आप किसी कठिन बात को कहने का ढंग न समझ पा रहे हों।
चिंतन प्रश्न
कौन-सी सच्ची बात आपको कहनी है — और आप उसे प्रेम से कैसे कह सकते हैं?
एक छोटा अभ्यास
आज किसी कठिन संदेश से पहले उसे परखिए: सच? प्रिय? हितकारी?
इस श्लोक पर चिंतन कीजिए, अपने विचार सहेजिए या इसे कार्ड के रूप में साझा कीजिए।
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