मार्गदर्शिकाएँ · शांति · ज़्यादा सोचना

भगवद्गीता 2.66

सुख शांति से उपजता है, और शांति एक ठहरे हुए मन से। शुरुआत ठहराव से कीजिए।

भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 66

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥

nāsti buddhir ayuktasya na cāyuktasya bhāvanā
na cābhāvayataḥ śāntir aśāntasya kutaḥ sukham

हिन्दी भावार्थ

जिसका मन संयमित नहीं है, उसमें न स्थिर बुद्धि होती है, न भावना। भावना के बिना शांति नहीं, और जो अशांत है, उसे सुख कहाँ?

अंग्रेज़ी अनुवाद · English translation

For one who is not inwardly settled, there is no clear understanding and no steady contemplation. Without contemplation there is no peace — and without peace, where is happiness?

सरल शब्दों में व्याख्या

सुख शांति से उपजता है, और शांति एक ठहरे हुए मन से। शुरुआत ठहराव से कीजिए।

संदर्भ

श्रीकृष्ण एक सरल क्रम बताते हैं: एकाग्र मन चिंतन संभव बनाता है, चिंतन शांति लाता है, और शांति सच्चा सुख संभव बनाती है।

यह कब मदद कर सकता है

जब आप सुख के पीछे भाग रहे हों पर भीतर बेचैनी हो।

चिंतन प्रश्न

आपके मन को थोड़ा भी ठहरने में क्या मदद करता है?

एक छोटा अभ्यास

आज दो मिनट कुछ भी मत कीजिए — न फ़ोन, न कोई काम। बस बैठिए।

इस श्लोक पर चिंतन कीजिए, अपने विचार सहेजिए या इसे कार्ड के रूप में साझा कीजिए।

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