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भगवद्गीता 5.29

आप अकेले नहीं हैं। गीता की दृष्टि में ईश्वर हर प्राणी का शुभचिंतक मित्र है — आपका भी।

भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 29

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥

bhoktāraṁ yajña-tapasāṁ sarva-loka-maheśvaram
suhṛdaṁ sarva-bhūtānāṁ jñātvā māṁ śāntim ṛcchati

हिन्दी भावार्थ

मुझे सब यज्ञों और तपों का भोक्ता, सब लोकों का महान ईश्वर और सब प्राणियों का सुहृद (मित्र) जानकर मनुष्य शांति प्राप्त करता है।

अंग्रेज़ी अनुवाद · English translation

Knowing me as the one who receives all offerings and efforts, the great Lord of all worlds, and the friend of all beings — one attains peace.

सरल शब्दों में व्याख्या

आप अकेले नहीं हैं। गीता की दृष्टि में ईश्वर हर प्राणी का शुभचिंतक मित्र है — आपका भी।

संदर्भ

श्रीकृष्ण स्वयं को 'सुहृद' बताते हैं — सब प्राणियों का निःस्वार्थ मित्र। कई पाठकों के लिए यह गीता की सबसे सांत्वना देने वाली पंक्तियों में से एक है।

यह कब मदद कर सकता है

जब आप अकेलापन महसूस करें, अनदेखा महसूस करें, या लगे कि कोई आपके साथ नहीं है।

चिंतन प्रश्न

कौन — या क्या — चुपचाप आपके साथ रहा है, तब भी जब आपने ध्यान नहीं दिया?

एक छोटा अभ्यास

किसी ऐसे व्यक्ति को धन्यवाद का छोटा-सा संदेश भेजिए जो चुपचाप आपका मित्र रहा है।

इस श्लोक पर चिंतन कीजिए, अपने विचार सहेजिए या इसे कार्ड के रूप में साझा कीजिए।

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